झाबुआ। विश्व पर्यावरण दिवस, जो हर साल 5 जून को मनाया जाता है, इस बार पूरे भारत में विशेष उत्साह और समर्पण के साथ मनाया गया। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। इनमें से एक अनूठा और प्रेरणादायक अभियान था #एक_पेड़_माँ_के_नाम, जिसने न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाया, बल्कि सामाजिक बुराइयों जैसे नशे की लत से मुक्ति के लिए भी लोगों को प्रेरित किया। इस अभियान के तहत देशभर में लाखों लोगों ने अपनी माँ के नाम पर पौधे लगाए और नशा मुक्ति के लिए शपथ ली, जिसने इस पहल को एक जन आंदोलन का रूप दे दिया। यह अभियान पर्यावरण और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हुआ, क्योंकि इसने लोगों को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का एहसास दिलाया। विश्व पर्यावरण दिवस का इस साल की थीम थी "भूमि पुनर्जनन, मरुस्थलीकरण रोकथाम और सूखा प्रतिरोध", जिसने लोगों को पर्यावरण के प्रति और अधिक जागरूक होने के लिए प्रेरित किया। #एक_पेड़_माँ_के_नाम अभियान ने इस थीम को आत्मसात करते हुए पौधरोपण के माध्यम से भूमि की उर्वरता को बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इस अभियान की शुरुआत पीएम मोदी द्वारा की गई, लेकिन जल्द ही यह पूरे देश में फैल गया। स्कूलों, कॉलेजों, गाँवों, शहरों और विभिन्न सामुदायिक केंद्रों में लोगों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। इस अभियान की सबसे खास बात यह थी कि इसमें हर आयु वर्ग के लोग शामिल हुए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी ने अपनी माँ के नाम पर पौधे लगाए और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। पौधरोपण के साथ-साथ नशा मुक्ति का संदेश इस अभियान का एक और महत्वपूर्ण पहलू था। नशा, जो आज समाज के लिए एक गंभीर समस्या बन चुका है, इसके खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए इस अभियान ने लोगों को एक मंच प्रदान किया। विभिन्न स्थानों पर आयोजित कार्यक्रमों में नशा मुक्ति की शपथ दिलाई गई, जिसमें लोगों ने नशे से दूर रहने और दूसरों को भी इसके खिलाफ प्रेरित करने का वचन लिया। यह शपथ न केवल व्यक्तिगत जीवन को बेहतर बनाने के लिए थी, बल्कि समाज को नशे के दुष्प्रभावों से मुक्त करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम था। इस अभियान के तहत आयोजित कार्यक्रमों में स्थानीय प्रशासन, गैर-सरकारी संगठनों, स्कूलों और कॉलेजों के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। कई जगहों पर पौधरोपण के लिए विशेष स्थानों का चयन किया गया, जैसे कि स्कूल परिसर, पार्क, नदियों के किनारे और बंजर भूमि। इन स्थानों पर नीम, पीपल, बरगद, आम, और अन्य स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए गए, जो न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी हैं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूत करते हैं। पौधों की देखभाल के लिए स्थानीय समुदायों को जिम्मेदारी सौंपी गई, ताकि ये पौधे बड़े होकर पेड़ बन सकें और पर्यावरण को दीर्घकालिक लाभ प्रदान करें।
नशा मुक्ति के लिए आयोजित शपथ समारोहों में विशेषज्ञों ने नशे के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता फैलाई। उन्होंने बताया कि नशा न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि परिवार और समाज पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इन समारोहों में नशा छोड़ चुके लोगों ने अपनी कहानियाँ साझा कीं, जिसने अन्य लोगों को प्रेरित किया। कई युवाओं ने इस अवसर पर नशे से दूर रहने का संकल्प लिया और अपने दोस्तों और परिवार को भी इसके लिए प्रेरित करने का वादा किया। इस अभियान ने सामाजिक एकता को भी बढ़ावा दिया। विभिन्न धर्मों, जातियों और समुदायों के लोग एक साथ आए और पर्यावरण संरक्षण और नशा मुक्ति के लिए एकजुट हुए। यह अभियान केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने लोगों में एक दीर्घकालिक जागरूकता पैदा की। कई संगठनों ने इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए नियमित पौधरोपण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर भी इस अभियान को व्यापक समर्थन मिला। #एक_पेड़_माँ_के_नाम हैशटैग के साथ लाखों लोगों ने अपने पौधरोपण की तस्वीरें और नशा मुक्ति की शपथ के वीडियो साझा किए, जिसने इस अभियान को और अधिक लोकप्रिय बनाया। सरकार ने भी इस अभियान की सराहना की और कई राज्यों में इसे आधिकारिक तौर पर समर्थन दिया। कुछ राज्यों में स्थानीय प्रशासन ने पौधरोपण के लिए मुफ्त पौधे उपलब्ध कराए, जबकि कुछ जगहों पर नशा मुक्ति के लिए विशेष काउंसलिंग सत्र आयोजित किए गए। यह अभियान पर्यावरण और समाज के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित करने में सफल रहा। एक ओर जहाँ पौधरोपण ने पर्यावरण को स्वच्छ और हरा-भरा बनाने में योगदान दिया, वहीं नशा मुक्ति की शपथ ने समाज को स्वस्थ और जागरूक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। इस अभियान ने यह भी दिखाया कि छोटे-छोटे प्रयास, जब सामूहिक रूप से किए जाते हैं, तो वे बड़े बदलाव ला सकते हैं। यह अभियान उन सभी माताओं को समर्पित था, जिन्होंने अपने बच्चों को जीवन दिया और समाज को बेहतर बनाने में योगदान दिया। प्रत्येक पौधा, जो माँ के नाम पर लगाया गया, न केवल पर्यावरण के लिए एक उपहार था, बल्कि माँ के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक भी था। इस अभियान ने लोगों को यह एहसास दिलाया कि पर्यावरण और समाज दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और दोनों के संरक्षण के लिए हमें मिलकर काम करना होगा।
