झाबुआ, मध्यप्रदेश। जब हालात विपरीत हों, सुविधाएँ सीमित हों और संसाधन नगण्य — तब किसी युवा का केवल सपना देखना ही नहीं, बल्कि उसे साकार करना एक मिसाल बन जाता है। ऐसा ही कर दिखाया है झाबुआ जिले की मेघनगर तहसील के छोटे से गांव जामदा के आयुष सिंगाड़ ने। हिंदी साहित्य विषय से मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की सहायक प्राध्यापक परीक्षा 2022 को उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण कर पूरे जिले का मान बढ़ा दिया।
ग्रामीण परिवेश से उठकर उच्च शिक्षा तक का सफर
24 वर्षीय आयुष का जीवन-संघर्ष एक साधारण किसान परिवार से शुरू होता है, जहाँ उनके पिता श्री मोहन सिंगाड़ और माता श्रीमती बाबुड़ी सिंगाड़ खेत में काम करने के साथ-साथ मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। आर्थिक सीमाओं के बावजूद उन्होंने अपने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। आज जब आयुष सहायक प्राध्यापक पद पर चयनित हुए हैं, तो न केवल उनका परिवार, बल्कि पूरा गांव उनके इस सफलता-पथ पर गर्व कर रहा है।
सपनों की राह आसान नहीं होती, पर संभव होती है
आयुष का कहना है कि यह सफर बहुत आसान नहीं रहा। गांव के सीमित संसाधनों और मार्गदर्शन की कमी ने कई बार उन्हें हतोत्साहित करने की कोशिश की, लेकिन उनका आत्मविश्वास और परिवार का समर्थन कभी डगमगाया नहीं। “मेरे माता-पिता ने खेत में पसीना बहाया ताकि मैं किताबों में डूबा रहूं,” — आयुष भावुक होकर कहते हैं।
खुद की मेहनत, खुद की दिशा
दिलचस्प बात यह है कि आयुष ने किसी कोचिंग या बाहरी मार्गदर्शन का सहारा नहीं लिया। उन्होंने खुद ही MPPSC की तैयारी की। इससे पहले उन्होंने UGC-NET और PHD परीक्षाएं पास कीं और अब वे विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से हिंदी विषय में पीएचडी कर रहे हैं। यह साबित करता है कि समर्पण और अनुशासन के साथ कोई भी लक्ष्य दूर नहीं होता।
कलेक्टर ने दी बधाई, बताया युवाओं के लिए उदाहरण
झाबुआ की कलेक्टर श्रीमती नेहा मीना ने आयुष को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उनका चयन जिले के अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा बन सकता है। “आयुष जैसे युवाओं की सफलता यह संदेश देती है कि अगर आप ईमानदारी से प्रयास करें तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं। मैं चाहती हूं कि वो अब शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हुए और युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दें।” आयुष की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई। बाद में उन्होंने स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई भी शासकीय संस्थानों से ही की। सरकारी व्यवस्था में रहते हुए भी उन्होंने अपने सपनों को सीमित नहीं होने दिया। उनका कहना है, “जब तक आप खुद पर विश्वास रखते हैं, तब तक कोई भी कठिनाई आपको रोक नहीं सकती।”
परिवार और गांव का गर्व
आयुष की सफलता से जामदा गांव में उत्सव जैसा माहौल है। उनके पिता श्री मोहन सिंगाड़ कहते हैं, “हमें हमेशा यकीन था कि आयुष कुछ अलग करेगा। लेकिन उसने तो गांव के हर युवा को सोचने पर मजबूर कर दिया कि पढ़ाई ही सबसे बड़ी ताक़त है।” उनकी माँ की आँखों में गर्व के आँसू हैं। वह कहती हैं, “हमने तंगी देखी है, लेकिन बेटे ने हमारी मेहनत को सम्मान दिलाया।” आयुष का यह मानना है कि गांव के युवाओं को खुद पर भरोसा रखना चाहिए। "कोचिंग या संसाधन न होने का मतलब यह नहीं कि आप पीछे हैं। आज इंटरनेट है, डिजिटल साधन हैं — अगर इच्छा है तो साधन मिल ही जाते हैं। सबसे ज़रूरी है अनुशासन, निरंतरता और सकारात्मक सोच।" सहायक प्राध्यापक पद पर चयन के बाद आयुष का सपना है कि वे शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे छात्रों को आगे लाएं जो प्रतिभाशाली तो हैं लेकिन साधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। वे झाबुआ जिले में एक निःशुल्क मार्गदर्शन केंद्र शुरू करने की योजना बना रहे हैं जहाँ ग्रामीण छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें।
आयुष सिंगाड़ की सफलता एक प्रमाण है कि यदि सही दिशा, समर्पण और संघर्ष की भावना हो, तो कोई भी युवा अपने सपनों को साकार कर सकता है — चाहे वह गांव के सबसे अंतिम छोर से ही क्यों न आता हो। यह उपलब्धि न सिर्फ एक व्यक्ति की जीत है, बल्कि उस पूरे समाज की जीत है जो अब यह समझने लगा है कि शिक्षा ही सबसे बड़ी क्रांति है।
