झाबुआ, मध्यप्रदेश। देश के सबसे पिछड़े माने जाने वाले जनजातीय अंचल झाबुआ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब जन-चेतना जागती है, तो कोई भी संसाधन असंभव नहीं रहता। इसी भावना के साथ झाबुआ और अलीराजपुर के भील आदिवासी समाज तथा शिवगंगा समग्र ग्राम विकास परिषद् को प्रतिष्ठित वॉटर डाइजेस्ट अवार्ड 2024–25 से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान “पानी पंचायत चैंपियंस” श्रेणी में UNESCO की सहभागिता में प्रदान किया गया। यह पुरस्कार किसी योजना या संस्था की जीत नहीं, बल्कि उस पूरे जनजातीय समाज के आत्मबल, सामूहिकता और जल परंपरा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है, जिसने जल संरक्षण को केवल सरकारी निर्देशों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जन-आंदोलन में बदल दिया।
हलमा: एक परंपरा नहीं, जीवनशैली
झाबुआ और अलीराजपुर की धरती पर सैकड़ों वर्षों से निवासरत भील समाज ने हमेशा प्रकृति को पूजनीय मानते हुए अपनी परंपराओं में जल, जंगल और जमीन को संरक्षित करने की संस्कृति को जीवंत बनाए रखा है। आधुनिक विकास की दौड़ में जब बड़े-बड़े शहर जल संकट से जूझ रहे हैं, तब इस जनजातीय समाज ने न केवल अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की, बल्कि सामूहिक प्रयास से सूखते स्रोतों को फिर से जीवन दिया। शिवगंगा समग्र ग्रामविकास परिषद्, जो पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से झाबुआ-अलीराजपुर क्षेत्र में काम कर रही है, ने जल संरक्षण को एक कार्यक्रम या योजना के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में अपनाया। उनकी सोच स्पष्ट थी—जल की रक्षा सिर्फ तकनीक से नहीं, बल्कि चेतना और सहभागिता से ही संभव है। झाबुआ अंचल में जल संरक्षण की यह अद्भुत यात्रा हलमा नामक भील परंपरा से शुरू हुई। हलमा का शाब्दिक अर्थ होता है - सामूहिक श्रम। यह कोई नया शब्द नहीं, बल्कि सदियों पुरानी वह परंपरा है जिसमें पूरा गांव एक स्थान पर एकत्र होकर सामूहिक श्रम के माध्यम से कोई बड़ा कार्य करता है — चाहे वह पहाड़ी को काटकर खेत बनाना हो या वर्षा जल रोकने की व्यवस्था करना। शिवगंगा परिषद ने इसी पारंपरिक व्यवस्था को आधुनिक विज्ञान और सामाजिक चेतना के साथ जोड़ा। हलमा के माध्यम से हजारों की संख्या में ग्रामीण पुरुष, महिलाएं, बच्चे – सभी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ जल संरचनाओं के निर्माण में जुट जाते हैं। 2024 के हलमा आयोजन में लगभग चार घंटे की निरंतर मेहनत से हजारों कंटूर ट्रेंच और जल संग्रहण गड्ढे तैयार किए गए, जिससे लाखों लीटर वर्षा जल संग्रह कर भविष्य की जल किल्लत को कम किया जा सका।
सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ पारिस्थितिक समृद्धि
इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा पहलू यह रहा कि इसमें सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि देशभर से छात्र, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और ग्राम विकास से जुड़े विशेषज्ञ भी पहुंचे। सभी ने मिलकर देखा कि कैसे एक आदिवासी अंचल अपने संसाधनों और परंपराओं से एक नई विकास गाथा लिख रहा है। यह आयोजन मात्र जल संरचना निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें जनजातीय संस्कृति, लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और जीवनशैली के दर्शन भी हुए। यह पूरा आयोजन ‘ग्राम समृद्धि नवकुंभ’ के रूप में उभरा – जहां ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भरता, जल-प्रबंधन और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का मेल दिखा।
अवार्ड से आगे: यह तो बस शुरुआत है
वॉटर डाइजेस्ट अवार्ड सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उस मेहनत की पहचान है, जो वर्षों से इन जनजातीय समुदायों ने की है। इन क्षेत्रों में पहले जल की भारी किल्लत रहती थी। गर्मियों में तो पानी के लिए महिलाओं को 3-4 किलोमीटर तक जाना पड़ता था। लेकिन अब हलमा जैसी गतिविधियों और सतत प्रयासों से न केवल पानी की उपलब्धता बढ़ी है, बल्कि खेती, पशुपालन और जीवनशैली में भी क्रांतिकारी बदलाव आया है। शिवगंगा समग्र ग्राम विकास परिषद की भूमिका इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। परिषद ने न केवल ग्रामीणों को प्रशिक्षित किया, बल्कि स्थानीय नेतृत्व को सशक्त किया। बच्चों को गांव की मिट्टी से जोड़कर, उनके मन में अपने गांव, जंगल और जल के प्रति प्रेम जागृत किया।
जल संरक्षण: योजनाओं से आंदोलन तक
भारत में वर्षों से जल संरक्षण को लेकर सरकारी योजनाएं चलाई जाती रहीं हैं। परंतु झाबुआ का यह मॉडल दिखाता है कि असली परिवर्तन तब आता है जब योजना में जन-भागीदारी, संस्कृति और समर्पण जुड़ जाए। भील समाज ने यह कर दिखाया है कि "पानी बचाओ" का नारा सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि मिट्टी से हाथ मिलाकर ही साकार होता है। इस उपलब्धि की गूंज न केवल राज्य और देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सुनाई दी। UNESCO की सहभागिता वाले इस पुरस्कार से यह सिद्ध हुआ कि विश्व भी अब आदिवासी परंपराओं की शक्ति को स्वीकार कर रहा है। शिवगंगा परिषद के कार्यों को सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG) के साथ जोड़ा जा रहा है, जिससे आने वाले समय में यह मॉडल अन्य राज्यों और देशों में भी दोहराया जा सकेगा।
जन-आंदोलन बना पानी का अभियान
शिवगंगा द्वारा संचालित "जल चौपाल" और "पानी पंचायत" जैसे अभियानों ने गांवों में परंपरागत जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का कार्य किया। हर गांव में स्थानीय समुदाय की बैठकें हुईं, बुजुर्गों से पारंपरिक जल स्रोतों की जानकारी ली गई, और युवाओं को साथ लेकर सामूहिक श्रमदान से कुएं, तालाब, बावड़ियाँ, और चेक डैम पुनः जीवंत किए गए। इन प्रयासों का सबसे खास पहलू यह रहा कि किसी बाहरी ठेकेदार या मशीनों के सहारे नहीं, बल्कि गांव की पूरी आबादी ने अपने हाथों से मिट्टी, पत्थर और संसाधनों का उपयोग कर जल संरचनाएं तैयार कीं। इससे न केवल जल संरक्षण हुआ, बल्कि सामाजिक एकता और सामूहिक स्वाभिमान की भावना भी गहरी हुई।
पुरस्कार से बढ़ी सम्मान की धार
वॉटर डाइजेस्ट अवार्ड को भारत में जल संरक्षण के क्षेत्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान माना जाता है। यह अवार्ड उन संस्थाओं और व्यक्तियों को दिया जाता है जिन्होंने जल संरक्षण के क्षेत्र में नवाचार, भागीदारी और सामाजिक चेतना के साथ उल्लेखनीय कार्य किया हो। इस वर्ष जब झाबुआ-अलीराजपुर के भील समाज और शिवगंगा को यह सम्मान "पानी पंचायत चैंपियंस" श्रेणी में मिला, तो यह न केवल इस क्षेत्र की सफलता की कहानी बना, बल्कि भारत के जनजातीय समाज के ज्ञान और दर्शन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी बन गया। भील समाज का जल संरक्षण केवल भौतिक संसाधनों का उपयोग नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता से प्रेरित रहा है। उनके लिए जल केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि 'जल देवता' है। शिवगंगा ने इस दर्शन को आधार बनाकर 'आध्यात्मिक विकास मॉडल' प्रस्तुत किया, जिसमें जल संरक्षण, ग्राम विकास और सामाजिक पुनर्निर्माण का समन्वय है। हर जल संरचना के निर्माण के साथ-साथ उसमें पूजा-अर्चना, गीत, नृत्य और उत्सव का समावेश किया गया, जिससे समाज में उत्साह बना रहे। इस प्रक्रिया में गांव की महिलाएं, बच्चे और युवा—सभी ने सक्रिय भागीदारी निभाई। परिणामस्वरूप न केवल जल स्तर में वृद्धि हुई, बल्कि गांवों में आजीविका, खेती और पशुपालन की स्थिति में भी सुधार आया।
नई पीढ़ी में जागरूकता की अलख
शिवगंगा और भील समाज ने अपने कार्यों को केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नई पीढ़ी को भी इसकी शिक्षा दी। स्कूलों, आंगनवाड़ियों और युवाओं के समूहों में जल जागरूकता के कार्यक्रम चलाए गए। लोकगीतों, नुक्कड़ नाटकों, चित्रकला और स्थानीय कहानियों के माध्यम से बच्चों को जल का महत्व समझाया गया। 'पानी का पाठशाला' जैसे कार्यक्रमों ने बच्चों में न केवल जानकारी बढ़ाई, बल्कि उन्हें अपने गांव का प्रहरी बना दिया। आज झाबुआ और अलीराजपुर के अनेक गांवों में बच्चे स्वयं जल स्रोतों की देखरेख करते हैं और जल अपव्यय के खिलाफ आवाज उठाते हैं।
सरकार, समाज और संस्थाओं के लिए प्रेरणा
शिवगंगा और भील समाज का यह मॉडल अब पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन चुका है। कई राज्यों से अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद झाबुआ का दौरा कर इस मॉडल को देखने और सीखने आ रहे हैं। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने भी इस कार्य की सराहना की है और इसे जनभागीदारी आधारित विकास की मिसाल बताया है। इस सम्मान के बाद उम्मीद की जा रही है कि इस मॉडल को देश के अन्य जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनाया जाएगा, जिससे संपूर्ण भारत में जल संरक्षण का एक सशक्त और आत्मनिर्भर आंदोलन खड़ा हो सके।यह पुरस्कार एक और संदेश देता है – कि भारत के आदिवासी समाज केवल 'विकास की दौड़' में पिछड़े नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी वैकल्पिक विकास गाथा रच रहे हैं जो स्थायी, सामूहिक और जैविक है। इन समाजों ने दिखाया है कि विकास का अर्थ सिर्फ सड़क, भवन और मशीनें नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामूहिक चेतना और प्रकृति के साथ संतुलन में रहना है।
"यह पुरस्कार हर उस हाथ का सम्मान है, जिसने मिट्टी उठाई, पसीना बहाया और धरती को जल से सींचा।"नई दिशा की ओर
झाबुआ के भील समाज और शिवगंगा के हलमा जैसे प्रयास आज एक आंदोलन बन चुके हैं। यह आंदोलन उन सभी के लिए प्रेरणा है जो विकास के नाम पर प्रकृति से टकराव करते हैं। वॉटर डाइजेस्ट अवार्ड के बहाने देश को यह अवसर मिला है कि वह अपनी जड़ों की ओर लौटे, आदिवासी ज्ञान, सामूहिक चेतना और संस्कृति को समझे और उन्हें विकास का आधार बनाए। आज जब हम पानी की हर बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब झाबुआ की यह यात्रा बताती है कि विकास वहीं टिकता है, जो संस्कृति और प्रकृति के साथ चलने की कला जानता है।

