भोपाल में राष्ट्रीय कार्यशाला: राजाराम कटारा ने झाबुआ का प्रतिनिधित्व कर राष्ट्रीय कार्यशाला में उठाई जनजातीय हितों की आवाज

National workshop in Bhopal: Rajaram Katara represented Jhabua and raised the voice of tribal interests in the national workshop.
झाबुआ फर्स्ट

भोपाल, 20 अप्रैल 2025: प्रदेश की राजधानी भोपाल में 18-19 अप्रैल 2025 को प्रशासनिक प्रशिक्षण भवन में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ने जनजातीय क्षेत्रों में सामुदायिक वन पुनर्स्थापना और जलवायु परिवर्तन अनुकूल आजीविका के मुद्दों पर गहन चर्चा का मंच प्रदान किया। इस कार्यशाला में झाबुआ अंचल का प्रतिनिधित्व करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता श्री राजाराम कटारा ने न केवल अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की, आपको बता दे की राजाराम कटारा को पूर्व में जननायक टंट्या भील सम्मान से भी नवाजा गया। यह सम्मान उनके सामाजिक कार्यों, विशेष रूप से जनजातीय समुदायों के उत्थान और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए प्रदान किया गया। शिवगंगा परिवार ने उनकी भागीदारी को झाबुआ की सामाजिक चेतना और वन आधारित जीवनदृष्टि की सशक्त आवाज बताया।

Jhabua First News - National-workshop-in-Bhopal-Rajaram-Katara-represented-Jhabua-and-raised-the-voice-of-tribal-interests-in-the-national-workshop- भोपाल में राष्ट्रीय कार्यशाला: राजाराम कटारा ने झाबुआ का प्रतिनिधित्व कर राष्ट्रीय कार्यशाला में उठाई जनजातीय हितों की आवाज

कार्यशाला का उद्देश्य और विषय

कार्यशाला का मुख्य विषय था “मध्य प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में सामुदायिक आधारित वन पुनर्स्थापना एवं जलवायु परिवर्तन अनुकूल आजीविका”। इस विषय के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों में सामुदायिक वन संसाधन (CFR) प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए टिकाऊ आजीविका के मॉडल पर विचार-विमर्श किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाने, उनके पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ने, और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए नीतिगत और व्यावहारिक समाधान खोजना था। कार्यशाला में देश के 22 राज्यों से आए 125 सामाजिक कार्यकर्ताओं, CFR विशेषज्ञों, और जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस मंच ने विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवों और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने का अवसर प्रदान किया, जिससे जनजातीय विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण विकसित हो सके।

श्री राजाराम कटारा: झाबुआ की आवाज

श्री राजाराम कटारा, जो झाबुआ के एक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता हैं, ने इस कार्यशाला में अपने क्षेत्र की चुनौतियों और अवसरों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने जनजातीय समुदायों के लिए वन आधारित आजीविका के महत्व पर बल दिया और सामुदायिक वन पुनर्स्थापना के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को एक साथ जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके विचारों ने न केवल झाबुआ के जनজातीय समुदायों की वास्तविक समस्याओं को उजागर किया, बल्कि उनके समाधान के लिए व्यावहारिक सुझाव भी प्रस्तुत किए। श्री कटारा ने कहा मैं इस मंच पर अपनी बात रखने और अपने समुदाय की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए आभारी हूँ।”

उल्लेखनीय उपस्थिति और उद्घाटन सत्र

कार्यशाला का उद्घाटन प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने जनजातीय समुदायों के कल्याण और पर्यावरण संरक्षण के लिए राज्य सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने कहा, “मध्य प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। सामुदायिक वन पुनर्स्थापना और जलवायु परिवर्तन अनुकूल आजीविका के माध्यम से हम इन समुदायों को सशक्त बना सकते हैं। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने कार्यशाला में केंद्र सरकार की नीतियों और योजनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने सामुदायिक वन संसाधन (CFR) के अधिकारों को लागू करने और जनजातीय समुदायों को वन प्रबंधन में भागीदार बनाने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है, और जनजातीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान इस चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।”

   इसके अतिरिक्त, मध्य प्रदेश के जनजाति कार्य मंत्री श्री कुँवर विजय शाह और महिला बाल विकास मंत्री श्रीमती निर्मला भूरिया ने भी कार्यशाला में अपने विचार साझा किए। श्री शाह ने वन अधिकार अधिनियम 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन और जनजातीय समुदायों के लिए टिकाऊ आजीविका के अवसरों पर जोर दिया, जबकि श्रीमती भूरिया ने महिलाओं की भूमिका को सामुदायिक वन प्रबंधन और आजीविका विकास में महत्वपूर्ण बताया। माननीय गिरीश जी कुबेर ने भी अपने संबोधन में जनजातीय समुदायों के सांस्कृतिक और पर्यावरणीय योगदान की सराहना की।


कार्यशाला के प्रमुख बिंदु

कार्यशाला में कई महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए, जिनमें निम्नलिखित विषयों पर चर्चा हुई:

  1. सामुदायिक वन संसाधन (CFR) प्रबंधन: वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत जनजातीय समुदायों को सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन और उपयोग के अधिकारों को लागू करने की प्रगति और चुनौतियों पर विचार-विमर्श।
  2. जलवायु परिवर्तन अनुकूल आजीविका: गैर-लकड़ी वन उत्पादों (NTFP) पर आधारित आजीविका मॉडल, जैसे महुआ, तendu पत्ता, और औषधीय पौधों का उपयोग, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक लाभ प्रदान करते हैं।
  3. जैव विविधता संरक्षण: जनजातीय क्षेत्रों में जैव विविधता के संरक्षण के लिए सामुदायिक भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग।
  4. नीतिगत और प्रशासनिक सुधार: सामुदायिक वन पुनर्स्थापना और आजीविका विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों में समन्वय और सुधार की आवश्यकता।

इन सत्रों में विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभव साझा किए और विभिन्न राज्यों में लागू किए गए सफल मॉडलों पर चर्चा की। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सामुदायिक वन प्रबंधन के सफल प्रयोगों को मध्य प्रदेश के संदर्भ में लागू करने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

झाबुआ के लिए महत्व

झाबुआ, जो मध्य प्रदेश का एक प्रमुख जनजातीय जिला है, इस कार्यशाला में विशेष रूप से चर्चा का केंद्र रहा। श्री राजाराम कटारा ने झाबुआ के जनजातीय समुदायों की ओर से सामुदायिक वन पुनर्स्थापना के लिए किए गए प्रयासों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि कैसे स्थानीय समुदायों ने वन संरक्षण के साथ-साथ गैर-लकड़ी वन उत्पादों पर आधारित आजीविका विकसित की है। उनके प्रयासों ने न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया है। शिवगंगा परिवार, जो झाबुआ में सामुदायिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्यरत है, ने श्री कटारा की इस उपलब्धि को ऐतिहासिक बताया। संगठन ने कहा, “राजाराम कटारा की भागीदारी और सम्मान झाबुआ के लिए गर्व का विषय है। उनकी आवाज ने राष्ट्रीय मंच पर जनजातीय समुदायों की चुनौतियों और संभावनाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।”

कार्यशाला के समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों ने सामुदायिक वन पुनर्स्थापना और जलवायु परिवर्तन अनुकूल आजीविका के लिए एक रोडमैप तैयार करने पर सहमति जताई। इस रोडमैप में निम्नलिखित बिंदु शामिल किए गए:

  • वन अधिकार अधिनियम के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों का शीघ्र और प्रभावी कार्यान्वयन।
  • गैर-लकड़ी वन उत्पादों पर आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देना।
  • जनजातीय समुदायों, विशेष रूप से महिलाओं, को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान करना।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान का समन्वय।

यह राष्ट्रीय कार्यशाला न केवल जनजातीय समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुई, बल्कि श्री राजाराम कटारा जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने में भी सफल रही। जननायक टंट्या भील सम्मान प्राप्त करने के साथ ही श्री कटारा ने झाबुआ के जनजातीय समुदायों की आवाज को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। यह आयोजन मध्य प्रदेश और पूरे देश के जनजातीय क्षेत्रों में सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। शिवगंगा परिवार और झाबुआ की जनता ने श्री कटारा को उनकी इस उपलब्धि के लिए पुनः बधाई दी और उनके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएं दीं। यह सम्मान और कार्यशाला दोनों ही इस बात का प्रमाण हैं कि सामुदायिक प्रयास और समर्पण के माध्यम से हम एक हरित और समृद्ध भारत का निर्माण कर सकते हैं।

न्यूज़ एडिटर

झाबुआ फर्स्ट
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