इस प्रश्न के जवाब में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने बताया कि 33 मामलों में से 27 मामलों का निराकरण उपभोक्ता के पक्ष में किया गया है। इससे यह साबित होता है कि बीमा कंपनियां भ्रामक प्रचार करके उपभोक्ताओं का शोषण कर रही हैं। ऐसी कंपनियों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। मंत्री श्री राजपूत ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमा अधिनियम केंद्र सरकार से जुड़ा हुआ है, लेकिन राज्य सरकार का दायित्व है कि वह उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस दिशा में मजबूती से काम कर रही है और आगे भी करती रहेगी। इस मामले में सरकार की ओर से सख्त कार्रवाई की मांग की जा रही है ताकि आम जनता को भ्रामक प्रचार और शोषण से बचाया जा सके। बीमा कंपनियों द्वारा की जा रही इस तरह की गलत प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे।
हेल्थ/बीमा कम्पनियों के भ्रामक प्रचार को लेकर विधानसभा में नीमच विधायक परिहार ने की चिंता व्यक्त
नीमच। सोशल और प्रिंट मीडिया के माध्यम से विभिन्न बीमा कंपनियां लगातार भ्रामक प्रचार करके आम जनता को गुमराह कर रही हैं और अपने स्वास्थ्य बीमा उत्पाद बेच रही हैं। आम जनता से लाखों रुपए वसूलने के बाद भी, जब उन्हें बीमा का लाभ लेने की आवश्यकता होती है, तो कंपनियां नियमों की जटिलताओं में उलझाकर उन्हें लाभ से वंचित कर देती हैं। इसके कारण हजारों स्वास्थ्य बीमा उपभोक्ताओं को न्यायालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इस मामले में सरकार को ऐसी कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। यह बात विधायक दिलीप सिंह परिहार ने विधानसभा में अपने तारांकित प्रश्न क्रमांक 2158 के माध्यम से उठाई। विधायक श्री परिहार ने यह भी पूछा कि क्या प्रदेश की विभिन्न बीमा कंपनियां, कोचिंग केंद्र और अन्य कंपनियां भ्रामक प्रचार के जरिए उपभोक्ताओं को लूट रही हैं? यदि हां, तो 1 जनवरी 2020 के बाद से प्रदेश में इन कंपनियों के खिलाफ कितनी शिकायतें दर्ज हुई हैं और किन-किन व्यक्तियों ने यह शिकायतें की हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि प्रदेश में भ्रामक विज्ञापनों को लेकर शासन के क्या निर्देश हैं? क्या प्रदेश की विभिन्न निजी बीमा कंपनियां हेल्थ इंश्योरेंस के मामले में 100 प्रतिशत कैशलेस बीमे का दावा करती हैं, लेकिन 41 प्रतिशत तक कटौती करती हैं? यदि हां, तो प्रदेश के विभिन्न उपभोक्ता न्यायालयों में इस अवधि में कितने मामले दर्ज हुए हैं और कितने मामलों का निराकरण उपभोक्ता के पक्ष में किया गया है?
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